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परमात्मा: एक परिकल्पना

 

1.  परिकल्पनाएं कैसे बनती हैं ?

डायनासोर धरती पर हुआ करते थे। फिर समाप्त हो गए। कैसे समाप्त हुए, इस बात को लेकर 140 परिकल्पनाएं हुई, यानि अनुमान लगाए गए। किसी ने कहा, भूकंप आए; किसी ने कहा तापमान बढ़ गया था; तो जो परिकल्पना या थ्योरी लोगों को अच्छी लगी, लोगों ने मान ली। हालांकि थी वह एक परिकल्पना ही। सत्य नहीं था क्योंकि सत्य को पीछे जा कर देखा नहीं जा सकता।

 

2.  परमात्मा की परिकल्पना क्यों और कैसे 

इसी तरीके से, यह सृष्टि कैसे बनी, सूरज चांद सितारे कहां से आए, इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए भी हज़ारों वर्षों से समय-समय पर बुद्धिमान और विद्वान लोगों ने बहुत जोर लगाया। बहुत अनुमान लगाए और उसके पक्ष में तर्क दिए।

किसी ने कहा कि, बिग बैंग (Big Bang) हुआ - एक बहुत बड़ा पटाखा फूटा और यह सृष्टि बन गई।किसी ने कहा कि एक अदृश्य शक्ति है परमात्मा, जिसने अपनी हथेली पर कुछ मिट्टी रखकर फूंक मारी और फूंक मारने से जो मिट्टी उड़ी उससे सृष्टि बन । और किसी ने यह कह दिया कि सातवें आसमान में बैठा हुआ कोई भगवान है, परमात्मा है, जिसने छह दिन में सृष्टि की रचना कर दी।

यह सारे ख्याल, यह सारे विचार, मात्र परिकल्पनाएं हैं। क्योंकि सत्य को पीछे जा कर देखा नहीं जा सकता।

 

3.  धर्म कैसे बने ? 

"कोई भगवान तो होगा ही संसार को बनाने वाला" - इस परिकल्पना को मजबूत करने के लिए संस्थाएं बन गई। सबके अपने-अपने भगवान हो गए। उन संस्थाओं को धर्म कहा गया। 

इन तथाकथित धर्मों के अंतर्गत इस परिकल्पना का प्रचार शुरू हो गया। प्रचार करने वाले गुरु पीर पैगंबर कहलाए। उनको सम्मान दिया गया। बड़े-बड़े राजा महाराजा उनके आगे झुकने लगे। इस तरीके से इस थ्योरी ने, यानि परिकल्पना ने ज़ोर पकड़ा। जिन्होंने इसको माना उनका भी सम्मान होने लगा, वे भक्त कहलाए। 

पीढ़ी दर पीढ़ी इस परिकल्पना को इतना दोहराया गया कि लोगों को ये सच लगने लगी वे भूल ही गए कि परमात्मामात्र एक परिकल्पना है!

 

4.  धर्मों के हथकंडे - भय और लालच:

धर्म के प्रचार में भय और लालच का बहुत चतुराई से प्रयोग किया गया। जैसे कि,

  • पुनर्जन्म का भय पैदा किया गया।
  • फिर नरक का भय और स्वर्ग का लालच भी इसमें जोड़ दिया गया। 
  • फिर दुखों का भय और सुखों का लालच भी जोड़ दिया गया। 

ये परिकल्पना लोगों के शोषण का कारण बन गई। लोगों को पंगु बना दिया गया यह कहकर कि सब करने वाला परमात्मा है। इस विचार को धारण करके लोग कर्महीन हो गए।

आगे चलकर धीरे-धीरे यह धर्म एक धंधा बन गए। और फिर आपसी भेदभाव और हिंसा का कारण बन गए। इन धर्मों के कारण बहुत युद्ध हुए, मानवता का बहुत नुकसान हुआ।  

 

5.  धर्म का सफर : परिकल्पना से युद्धों तक 

परिकल्पना से धर्म बन गए। 

कहीं-कहीं यह भी सोचा जाने लगा कि धर्म हमें नैतिकता प्रदान करते हैं। किंतु वास्तव में, धर्म में भ्रष्टाचार और राजनीति शामिल हो गई। ये कट्टरता इतनी बढ़ गई कि धर्म के नाम पर लोग मरने-मारने लगे। यही धर्म युद्धों के कारण बन गए और उतने लोग लड़ाइयों में नहीं मरे जितने धर्म के नाम पर मारे गए


6.  तो फिर वास्तविक धर्म क्या है? परमात्मा क्या है? आत्मा क्या है? मरणोपरान्त क्या होगा?


प्र: धर्म क्या है

उ: वास्तव में इंसानियत ही सच्चा धर्म है। 

धर्म जीवन जीने की एक शैली है और धर्म का परमात्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इसीलिए विश्व में बहुत सारे गॉडलेस (Godless) धर्म भी हैं जैसे ताओ धर्म, कन्फ़्यूशियस धर्म, बुद्ध धर्म और जैन धर्म इत्यादि।

 

प्र: परमात्मा क्या है

उ: प्रकृति ही परमात्मा है। 

तथाकथित परमात्मा इंसानों द्वारा की गई केवल एक परिकल्पना है। और धर्म ग्रंथ भी कोई आसमान से नहीं उतरे हैं बल्कि इंसानों द्वारा ही लिखे गए हैं। वास्तव में, यह परिकल्पना निराधार है, ऐसी कोई भी आसमानी शक्ति नहीं है, और यह प्रकृति अपने आप में संपूर्ण हैऔर यह प्रकृति ही परमात्मा है।

प्रकृति कैसे बनी, ये कोई नहीं जानता। लेकिन यह प्रकृति ही है जो सर्व्यापक है। यही प्रकृति सर्वशक्तिमान भी है, इसी से सब पैदा होता है और इसी में सब विलीन हो जाता है। ये प्रकृति अपने आप में सम्पूर्ण है, यही सब कुछ है। 

वेदों ने भी प्रकृति को ही परमात्मा माना है। जब यह कहा गया कि"एको ब्रह्म द्वितियो नास्ति” अर्थात् 'केवल ब्रह्म ही है, ब्रह्म के सिवाय दूसरा कुछ नहीं', तो फिर समस्त प्रकृति को ही ईश्वर माना गया है। और कोई दूसरी शक्ति इस प्रकृति से अलग, इस सृष्टि को चला रही है, ऐसी कोई मान्यता नहीं है। इस तरहगहराई से देखें तो सनातन परंपरा भी Godless ही है। 

 

प्र: आत्मा क्या है

उ: आत्मा वास्तव में ‘ब्रेन पावर’ है। 

प्रकृति के सिवाय ना कहीं स्वर्ग है, ना कोई नर्क है, ना कोई आत्मा है, ना पुनर्जन्म है, ना ही कोई पाप-पुण्य का हिसाब रख रहा है। ये सब भ्रमजाल धर्मों ने फैलाया हुआ है इंसान को डराने के लिए और अपने हिसाब से चलाने के लिए। 

जिसे हम आत्मा कहते हैं, वह वास्तव में ‘ब्रेन पावर’ है, यानि दिमाग की क्षमता। आत्मा की सारी क्षमताएं, दिमाग की ही क्षमताएं हैं। जैसे ब्रेन (दिमाग) ही देख रहा है आखों के माध्यम से, ब्रेन ही सुन रहा है कानों के माध्यम से, और इसी तरह ब्रेन ही सारे शरीर को चला रहा है।

वास्तव में, हम देखते भी हैं कि,

When brain is dead, I am dead

When brain is unconscious, I am unconscious

If brain is sharp, I am sharp

When brain thinks, I think

So, I am nothing but brain power.


प्र: मरणोपरान्त क्या होता है

उ: कोई पुनर्जन्म नहीं है।  

ना कोई स्वर्ग है, ना कोई नर्क है, ना ही कोई पुनर्जन्म है। पांच तत्वों से बना हुआ ये शरीर प्रकृति के पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। और इसी के साथ दिमाग यानि ब्रेन पावर यानि आत्मा का भी कोई अस्तित्व नहीं रहता। 

 

निष्कर्ष:

तथाकथित परमात्मा एक परिकल्पना ही है। 

यह प्रकृति अपने आप में संपूर्ण है, यही प्रकृति सर्व्यापक है, सर्वशक्तिमान भी है, इसी से सब पैदा होता है और इसी में सब विलीन हो जाता है। यह प्रकृति ही परमात्मा है।

इंसानियत ही सच्चा धर्म है। धर्म जीवन जीने की एक शैली है और धर्म का परमात्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। इंसानियत के सिवाय सभी मौजूदा धर्मों को तिलांजलि देकर ही विश्व में चिरस्थायी शांति हो सकती है। 


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